Friday, 28 December 2012

वो भला दिल को क्या दुखायेंगे ,  जो कभी दिल के करीब ही नहीं आयेंगे !
दिल को तो वो दुखते हैं ,  हम जिन्हें अपने दिल में ज़गह देते हैं ........

Thursday, 27 December 2012


हे रावण तूने तो अपनी मुक्ति हेतु किया था सीता का हरण,
किन्तु आज हर दूसरा कर रहा है तेरा अनुसरण................

Saturday, 22 December 2012

दिलवालों की दिल्ली

दिलवालों की दिल्ली में दिल का कोई मोल नहीं,
खाते हैं सब शक्कर भी पर मीठे इनके बोल नहीं .....

तलबगार


कहने को सबने कह दिया इंसानियत शर्मसार है, क्या इसके लिए हमारा परिवेश हीं नहीं जिम्मेदार है, नज़र उठा के देखिएहर आदमी हवश का शिकार है
आज का हर इंसान इंसानियत का तलबगार है........  

Monday, 22 October 2012

अहिल्या

अहिल्या ने प्रभु राम का
रखा था मन
उठ खड़ी हुई थी ससम्मान।
त्याग कर अपना आत्मसम्मान,
धन्य प्रभु आपने दिया
संघर्षमय जीवन का वरदान।
अतः हर युग में करना पड़ा
अहिल्या को विषपान।
कभी जली है
कभी लुटी है
फिर भी देती रही
हर युग में जीवन दान।
वह पाषाण नहीं
जड़ हो गई थी।
पाकर प्रेम का ज्ञान।
हर युग में शापिता कही गई
रखने को विधाता का मान।

Saturday, 12 May 2012

बेटियाँ


युग -युगान्तर से
यही प्रथा चली आ रही है
बेटे घर का चिराग
और बेटियां....
पराया धन कही जा रही हैं,
बेटे गर वंश-बेल हैं
तो बेटियां......
हाथों की कठपुतलियों का खेल हैं,
बेटों के लिए.....
हाथों में चाबुक,
घोड़े की सवारी,
और बेटियां......
जैसे बिन मांगी महामारी,
ना जाने ये परम्परा
कब तक चलेगी,
बेटों को जन्म देने वाली बेटियां
कब तक जलेगी ?

Tuesday, 24 April 2012

क्या लिखूँ मैं!


कभी सोचती हूँ
कविता या कोई
कहानी लिखूँ मैं
या फिर रीसते हुए
ज़ख्मों की
जुबानी लिखूँ मैं!
कभी देखी थी
महफ़िल
क़हकहों की
अब क्या
आँसुओं की
जुबानी लिखूँ मैं!
झूठे वादों
और फ़रेबों की
इस दुनियाँ में
कैसे कोई कहानी
रूमानी लिखूँ मैं!
या फिर
उपहार स्वरूप
मिली हुई
इस दर्द की
निशानी लिखूँ मैं!
क्या अब भी
कोई कविता
या........
कोई कहानी
लिखूँ मैं?
           सुनीता 'सुमन'

Sunday, 22 April 2012

माँ का कर्ज


मैं उन रातों का हिसाब तो नहीं दे सकती
जो तुमने मेरे लिए जाग कर बिताई होगी
बस इतनी सी कामना है ईश्वर से कि,
वो तुम्हें मेरे हिस्से कि
थोड़ी सी सुकून की नींद दे-दें,
मैं उन स्नेह का, दुलार का
मूल्य  भी नहीं चुका सकती
जो तुमने मेरे मचलने
और मेरे इतराने पर भी
बरसाया होगा।
अब, इतनी सी कामना है ईश्वर से
कि, वो मुझे तेरा साथ कुछ पल और दे-दें।
मुझे आज भी याद है
कि, मैंने कभी हठ से
कभी मनुहार से
अपनी मनमानी पूरी करवाई है
अब, बस इतनी सी हसरत है
कि, ईश्वर मुझे तेरा साथ
कुछ क्षण और दे-दें।
यह जानती हूँ की
नई कोपलों के लिए
पुराने को जगह रिक्त करनी ही होती है।
पर, माँ ......
मुझे ये जीवन
कभी जेठ बन जलता है
कभी पूस बन ठिठुरता है
पर तेरी गोद
मुझे आज भी
छाँव देती है,
तेरा आँचल
मुझे पूस से बचाता है।
अब बस इतनी सी
आरजू है ईश्वर से
की, तेरी छाँव
कुछ पल और दे-दें।
कभी मिले जो ईश्वर
तो मैं, हक़ से पूछूंगी
की,
जेठ और पूस की तरह
तू बसंत भी क्यूँ बनता है।

Thursday, 19 April 2012

सवाल २


अपने सपने अपने अरमानो को रख के ताख पे हम चुपचाप निकल जाते हैं,
फिर फिर न जाने क्यूँ हम ही बेरहम जमाने के निशाने पे आ जाते हैं !

सवाल

अक्सर मेरी तनहाई मुझसे ये सवाल दुहराती है,
जब मैं तेरे साथ हूँ फिर तुझे किसी और की जरुरत क्यूँ पड़ जाती है ?

आदित्य


आदित्य है बड़ा बेरहम
सारा दिन जलाता है,
सैन्झ ढले जाते-जाते
अँधेरे का साम्रज्य छोड़ जाता है।
निशा के घन तं में
साडी रत भटक क्र भी
शशी तन्हा रह जाता है
किन्तु जाते-जाते भी वह
एक न्य सवेरा छोड़ जाता है।
इनके बिच है गोधुली बेला
जो आगत विगत से अनजान
दो पल की खुमारी में
तन्हा डूबा रह जाता है।

Sunday, 8 April 2012

तनहाई-२


फिर से उपवन महक आई है,
फिर कोई कली खिलने को अकुलाई है,
ये किसने दिया है दस्तक,
ये किसकी आहट आई है,
फिर मन पुलकित हुआ है,
फिर अलकों पे घटा छाई है,
आज फिर कोयल ने कुक लगाई  है,
आज फिर महुआ से महक आई है,
आज फिर रिक्त हुआ है कोई,
आज फिर नव किसलय दल छाई है,
आज फिर हवा से कुण्डी खड़की है,
आज फिर फिर मेरे द्वार पे तनहाई है।

मेरा शहर


अजीब सा है ये शहर कुछ
परेशान यहाँ हर शहरी है,
कौन सुनेगा अब दिल की
यहाँ दीवारें भी बहरी हैं,
कोई नहीं आता है अब
मेरे तनहाई के डेरे में,
तनहा ही रहते हैं अब
हम अरमानों के घेरे में,
उनसे दिल की कहनी चाही
जो शायद मेरे अपने थे,
आँख खुली सब टूट गया
वो सब, झूठे सपने थे।

Saturday, 31 March 2012

अकुलाहट


एक अकुलाहट सी रहती है,
कि खोल कर मन के पन्ने
उकेरूँ  कुछ अहसास ।
तहों में दबा मुखर हो जाए
मन का सुवास ।
और पुरवा के संग उड़ जाने दूँ
उस ओर जहाँ
वृतों में घिरे तुम अकुला रहे होवो ।
फिर छूकर उड़े
पुरवा उस ओर जहाँ मिलती हैं
तमाम नदियाँ अपने सागर से
कुछ पल ठिठक कर
देखे वो अनुपम नज़ारा
और ले सीख,
कि बँधकर वृतों में
नहीं जीना उसे
लेकर उपनामों की भीख ।
वो बेखौफ़ बेपरवाह
उड़ जाने को उद्धत्
रचे अपने लिए शब्दों का संसार
निर्माणरत,निर्भय रचे अपने लिए
अपने सपनों का संसार ।
जहाँ हो चतुर्दिक हास।
गुंजायमान हो परिहास
फैला हो दूर तक सुहास  
जहाँ न हो कोई उच्छ्वास
ठहर कर रह जाए मधुमास ।।
               
                    "पत्थर का दर्द"

Monday, 26 March 2012

उम्मीद


रात काली आ मुझे बताती
कि, सुबह ज़रूर आएगी,
तनहाई की शाम के बाद
सुबह महफ़िल में गाएगी।
जिसे दिल ने चाहा बहुत
उसे याद मेरी भी आएगी,
दिल चाहेगा जब जिसको भी
तनहाई बहुत तड़पाएगी।
हम भी महफ़िल में बैठे थे
हमने भी महफ़िल जाना था,
दुनियाँ की नज़रों में गिरकर भी
हमने जीना जाना था।
डगमग क़दम हमारे भी
हमने भी सम्भलना जाना था,
रोते हुए वीरानों को भी
खिलती कलियाँ दिखलाना था।
हम रोए भी और तड़पे भी
हमने हँसना भी जाना था,
हवा से जब कुंडी खड़की
उम्मीद किसी का आना था।
उम्मीद किसी की लिए हुए
मौसम का आना-जाना था,
बेकार उसे हम क्यों रोयें
जिसे लौट कभी ना आना था।

इस दुनियाँ में

यहाँ हर बज़्म हर जज़्बात को बिकते देखा
ग़मे दिल ग़मे हालात पर मिटते देखा,
देख लिया इतना कि कोई तमन्ना न रही
वक़्त पड़ते ही अपने साये को सिमटते देखा,
कौन कहता है यहाँ रिशते बनाए जाते है
यह वो दुनियाँ है जहाँ रिशतों को बिखरते देखा,
चंद लम्हे को सभी अपने बनते हैं मगर
साथ जीने वालों को साथ न  मरते देखा,
हम खुशनसीब रहे हमें प्यार तो नसीब रहा
प्यार कि दुनियाँ को पलकों में उजड़ता देखा,
हमने कुछ देर की गुलशन में बहारें देखी
एक झोंके से यहाँ बागों को उजड़ते देखा।।
                                     -पत्थर का दर्द

Saturday, 17 March 2012

कलयुग के दोहे


अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिए दौर....
वोट जित ले जाते नेता, बाँट मुफ्त की सौर।

विद्या-धन-उधम बिना, कहाँ जू पावै कौन....
सब मुँह देखी बात थी, अब नेता हैं मौन।

भले बुरे सब एक सौं, जो लौं बोलत नहीं....
जैसे सज्जन बनते नेता, ऋतु चुनाव के माहिं।


कारज धीरे होते है, काहे होत अधीर....
नेता चिकना है घड़ा, केतक बहाओ नीर।

सुमन निज मन की बिथा, मन ही रखो गोय....
कुर्सी फले-फुलाए नहीं, केतक सींचे कोय।

सुमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारी....
सुलह सुई का काम क्या, अब उठा लीजिए तलवारी।

Thursday, 26 January 2012

हम नवयुग के निर्माता


हम नवयुग के निर्माता।।
कर्म शांति का,  धर्म शांति का
दीप लिए बढ़ते जाएं,
निर्धनता को दूर भागकर
पथ पर आगे बढ़ते जाएँ।
नव संदेशा सूरज लाता
हम नवयुग एक निर्माता।।
मानवता का मित्रता का
मशाल लिए बढ़ते जाएँ,
जातीयता का बंधन तोड़
जग को न्य मार्ग दिखाएँ।
आशा गीत पवन है गाता
हम नवयुग के निर्माता।।
शिक्षा की और ज्ञान की
ज्योति लिए बढ़ते जाएँ,
निरक्षरता के निविड़ तम के
राह को ज्योतिर्मय बनाएँ।
हमें बेठना नहीं सुहाता,
हम नवयुग के निर्माता।।
मातृ-भूमि के उर के
होते, टुकड़े जोड़ते जाएँ,
छोटे-छोटे टुकड़े जोड़
सफल राष्ट्र को एक बनाएँ।
हमें नहीं अलगाव है भाता,
हम नवयुग के निर्माता।

प्रहरी


मेरा शत्-शत् प्रणाम तुम्हें
तेरी हो जय सदा जगत में,
कामना सदा यही रही
हे भारत के वीर सिपाही।
तुम हो हमारे भाई बन्धु,
तुम्ही गंगा हो तुम्ही हो सिन्धु,
मातृ भूमि है तुम पर गर्वित
तुमसे ही है देश यह हर्षित।
तुममे है शक्ति अगम अभेध
जिसे शत्रु, न सका है भेद,
तुम्हें जिसने ललकारा है
झुक गया देश वह सारा है।
तुम हो रक्षक तुम्ही प्रहरी
तुम्हें है अर्पित खुशिया हमारी,
तुम रहे सदा पर्वत से अचल
तुम पर है आश्रित आज और कल।

देश प्रेम


चलो मिलके मेरे बन्धु
हम नया एक साज बनाएँ,
देश प्रेम का राग छेड़कर
एकजुट हो गुनगुनाएँ,
न हो कोई भेद-भाव
ऊँच नीच का भेद मिटाएँ,
निरक्षता के कलंक धो
अक्षर को अक्षर से मिलाएँ,
जननी हमारी जन्मभूमि है
इस पर अपनी जन लुटाएँ,
देश-प्रेम का दीप जलाकर
आगे ही आगे बढ़ते जाएँ ।।