आदित्य है बड़ा बेरहम
सारा दिन जलाता है,
सैन्झ ढले जाते-जाते
अँधेरे का साम्रज्य छोड़ जाता है।
निशा के घन तं में
साडी रत भटक क्र भी
शशी तन्हा रह जाता है
किन्तु जाते-जाते भी वह
एक न्य सवेरा छोड़ जाता है।
इनके बिच है गोधुली बेला
जो आगत विगत से अनजान
दो पल की खुमारी में
तन्हा डूबा रह जाता है।
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