Tuesday, 24 April 2012

क्या लिखूँ मैं!


कभी सोचती हूँ
कविता या कोई
कहानी लिखूँ मैं
या फिर रीसते हुए
ज़ख्मों की
जुबानी लिखूँ मैं!
कभी देखी थी
महफ़िल
क़हकहों की
अब क्या
आँसुओं की
जुबानी लिखूँ मैं!
झूठे वादों
और फ़रेबों की
इस दुनियाँ में
कैसे कोई कहानी
रूमानी लिखूँ मैं!
या फिर
उपहार स्वरूप
मिली हुई
इस दर्द की
निशानी लिखूँ मैं!
क्या अब भी
कोई कविता
या........
कोई कहानी
लिखूँ मैं?
           सुनीता 'सुमन'

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