फिर से उपवन महक आई है,
फिर कोई कली खिलने को अकुलाई है,
ये किसने दिया है दस्तक,
ये किसकी आहट आई है,
फिर मन पुलकित हुआ है,
फिर अलकों पे घटा छाई है,
आज फिर कोयल ने कुक लगाई है,
आज फिर महुआ से महक आई है,
आज फिर रिक्त हुआ है कोई,
आज फिर नव किसलय दल छाई है,
आज फिर हवा से कुण्डी खड़की है,
आज फिर फिर मेरे द्वार पे तनहाई है।
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