Sunday, 8 April 2012

मेरा शहर


अजीब सा है ये शहर कुछ
परेशान यहाँ हर शहरी है,
कौन सुनेगा अब दिल की
यहाँ दीवारें भी बहरी हैं,
कोई नहीं आता है अब
मेरे तनहाई के डेरे में,
तनहा ही रहते हैं अब
हम अरमानों के घेरे में,
उनसे दिल की कहनी चाही
जो शायद मेरे अपने थे,
आँख खुली सब टूट गया
वो सब, झूठे सपने थे।

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