रात काली आ मुझे बताती
कि, सुबह ज़रूर आएगी,
तनहाई की शाम के बाद
सुबह महफ़िल में गाएगी।
जिसे दिल ने चाहा बहुत
उसे याद मेरी भी आएगी,
दिल चाहेगा जब जिसको भी
तनहाई बहुत तड़पाएगी।
हम भी महफ़िल में बैठे थे
हमने भी महफ़िल जाना था,
दुनियाँ की नज़रों में गिरकर भी
हमने जीना जाना था।
डगमग क़दम हमारे भी
हमने भी सम्भलना जाना था,
रोते हुए वीरानों को भी
खिलती कलियाँ दिखलाना था।
हम रोए भी और तड़पे भी
हमने हँसना भी जाना था,
हवा से जब कुंडी खड़की
उम्मीद किसी का आना था।
उम्मीद किसी की लिए हुए
मौसम का आना-जाना था,
बेकार उसे हम क्यों रोयें
जिसे लौट कभी ना आना था।
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