खुल कर जब न कर सकें
हम अपने भावों को प्रकट
जब अपने ही विचारों पर
आन पड़े हो संकट
जब अपने उद्गार को
दबा देने को हों विवश,
फिर बोलो हे बंधू-जन
कैसे मनाएँ स्वतंत्रता दिवस !
अंग्रेजों ने भारत छोड़ा
मिली हमें आज़ादी है,
जब अपने ही शत्रु बनें
मैं कहती हूँ बर्बादी है,
क़लम हुआ कितनों का सर
किन्तु नहीं बुझी है प्यास,
फिर बोलो हे बंधू-जन
कैसे मनाएँ स्वतंत्रता दिवस !
अपनी भाषा भूल जहाँ हम
और भाषा अपनाते हों,
भूल अपनी संस्कृति को
गुलामी की ढोल बजाते हों,
भाषा और संस्कृति ही जब
रो रही सिसक-सिसक,
फिर बोलो हे बंधू-जन
कैसे मनाएँ स्वतंत्रता दिवस !
पूरब का उगता सूर्य छोड़
जब पश्चिम को हम जाते हैं,
विद्वानों की धरती पर फिर
मुर्ख ही हम कहलाते हैं,
निरक्षरता के अंधकार में
डूबा हो जब सारा दिवस,
फिर बोलो हे बंधू-जन
कैसे मनाएँ स्वतंत्रता दिवस !
No comments:
Post a Comment