Saturday, 6 August 2011

बूँद का अस्तित्व

आकास की छाती भी शायद
व्यथा से उमड़ी घुमड़ी होगी,
आँखें दर्द से भर आई होगी
फिर बूँद बन धरा पर आई होगी
और बारिस कहलाई होगी ।
उधर आसमा का कलेजा
चाक होता है
इधर धरती तृप्त होती है
एक बूँद ही है जो
अम्बर की पलकों से गिरकर
अपना अस्तित्व खोती है ।
सुनीता 'सुमन'
" पत्थर का दर्द "

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