आकास की छाती भी शायद
व्यथा से उमड़ी घुमड़ी होगी,
आँखें दर्द से भर आई होगी
फिर बूँद बन धरा पर आई होगी
और बारिस कहलाई होगी ।
उधर आसमा का कलेजा
चाक होता है
इधर धरती तृप्त होती है
एक बूँद ही है जो
अम्बर की पलकों से गिरकर
अपना अस्तित्व खोती है ।
सुनीता 'सुमन'
" पत्थर का दर्द "
व्यथा से उमड़ी घुमड़ी होगी,
आँखें दर्द से भर आई होगी
फिर बूँद बन धरा पर आई होगी
और बारिस कहलाई होगी ।
उधर आसमा का कलेजा
चाक होता है
इधर धरती तृप्त होती है
एक बूँद ही है जो
अम्बर की पलकों से गिरकर
अपना अस्तित्व खोती है ।
सुनीता 'सुमन'
" पत्थर का दर्द "
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