Thursday, 4 August 2011

इबारत

मैं रेत पर लिखी गयी
कोई इबारत तो नहीं,
लहरें जिसे खींच ले जाएँ
और मेरा वज़ूद मिट जाए।
मैं वो हक़ीकत हूँ जो
सांसों से बयां होती हूँ,
मैं वो सच हूँ जो
धड़कन से बयां होती हूँ।
मैं कोई गुज़रा हुआ वक्त तो नहीं
जिसे लौटाया न जा सके ,
और कोई बीता हुआ मौसम
की,जिसे बुलाया न जा सके।
मैं वो वर्तमान हूँ जो
भूत अभी हुआ नहीं,
मैं वो अहसास हूँ जिसे
महसूस हर कोई कर सके।
                     सुनीता 'सुमन'
                    "पत्थर का दर्द"

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