Monday, 14 March 2011

मेरा पड़ोसी

मेरा पड़ोसी वह दीर्घायु
शीतलता का अम्बार,
अक्सर कह जाता है मुझसे बहुत कुछ
वह पीपल का अधेड़ वृक्ष |
जब भी चलती है बासंती बयार ,
अपनों से छूटने की
व्यथा का करता है मूक इकरार |
और ......................
नव किसलय दल का
बाहें पसार,
हुलस कर करता है नित्य इंतजार |
जेठ-बैशाख में तप कर ,
अब भी बचे हैं कुछ रूखे से ,
कुछ सूखे से पत्ते |
जिन्हें शायद इंतजार है .................
सावन भादो की ,
कि, फूहारें भर देंगी नवजीवन ,
उसके भी मुरझाय यौवन में
किन्तु क्या पता !
उन्हें भी ...................
प्रकृति के भावसिक्त होना पड़ेगा ,
नव-किसलय-दल हेतु
उन्हें भी रिक्त होना पड़ेगा |
ऐसे ही छिपे उस पीपल में असंख्य अर्थ है
वर्ना तो जीवन खाली है , व्यर्थ है |||

                                     -"पत्थर का दर्द"

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