हवा के एक झोंके से
महक उठती थी दिशाएँ
तितलियों के प्यार से
खिल उठता था
जिसका मन
और, भौरों को
पास बुला
छुपा लेती थी
खुद में उसका तन,
कभी देवों के सर पे
चढ़ इठलाती थी
कभी,
प्रगाढ़ प्रेम की
बनती थी निशानी
आज असके सर पे
लगी है रस्ते की धूल
क्या होगा उसका अस्तित्व
वो तो है
एक सूखा हुआ फूल |
महक उठती थी दिशाएँ
तितलियों के प्यार से
खिल उठता था
जिसका मन
और, भौरों को
पास बुला
छुपा लेती थी
खुद में उसका तन,
कभी देवों के सर पे
चढ़ इठलाती थी
कभी,
प्रगाढ़ प्रेम की
बनती थी निशानी
आज असके सर पे
लगी है रस्ते की धूल
क्या होगा उसका अस्तित्व
वो तो है
एक सूखा हुआ फूल |
Just wow !!!
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