Friday, 1 February 2013
Friday, 28 December 2012
Thursday, 27 December 2012
Saturday, 22 December 2012
दिलवालों की दिल्ली
दिलवालों की दिल्ली में दिल का कोई मोल नहीं,
खाते हैं सब शक्कर भी पर मीठे इनके बोल नहीं .....
खाते हैं सब शक्कर भी पर मीठे इनके बोल नहीं .....
तलबगार
कहने को सबने कह दिया इंसानियत शर्मसार है, क्या इसके लिए हमारा परिवेश हीं नहीं जिम्मेदार है, नज़र उठा के देखिएहर आदमी हवश का शिकार है
आज का हर इंसान इंसानियत का तलबगार है........
Monday, 22 October 2012
अहिल्या
अहिल्या ने प्रभु राम का
रखा था मन
उठ खड़ी हुई थी ससम्मान।
त्याग कर अपना आत्मसम्मान,
धन्य प्रभु आपने दिया
संघर्षमय जीवन का वरदान।
अतः हर युग में करना पड़ा
अहिल्या को विषपान।
कभी जली है
कभी लुटी है
फिर भी देती रही
हर युग में जीवन दान।
वह पाषाण नहीं
जड़ हो गई थी।
पाकर प्रेम का ज्ञान।
हर युग में शापिता कही गई
रखने को विधाता का मान।
Saturday, 12 May 2012
बेटियाँ
युग -युगान्तर से
यही प्रथा चली आ रही है
बेटे घर का चिराग
और बेटियां....
पराया धन कही जा रही हैं,
बेटे गर वंश-बेल हैं
तो बेटियां......
हाथों की कठपुतलियों का खेल हैं,
बेटों के लिए.....
हाथों में चाबुक,
घोड़े की सवारी,
और बेटियां......
जैसे बिन मांगी महामारी,
ना जाने ये परम्परा
कब तक चलेगी,
बेटों को जन्म देने वाली बेटियां
कब तक जलेगी ?
Subscribe to:
Posts (Atom)
