एकाग्रचित,
अविचल,
आलिंगनबद्ध,
वर्षों के अन्तराल में भी
आया नहीं कोई अंतर,
उगते रवि ने भी
जिसका नमन किया
डूबते हुए भी जिसने
उसे अलविदा किया,
नित्य हसरत से
निहारता रहा जिसे
निशा राही शशि भी,
हवाएं भी
जिनके मघ्य
जगह न बना सकीं
सावन की फुहारें भी
जिन पर सिहर कर गिरती हैं,
वसंत भी जिनपर
हुलस के आता है,
ओस की बूंदें
जिनकी प्यास बुझाती हैं,
वो सुदूर खड़े
दो ताड़ के वृक्ष,
मुझे जनम-जनम के
प्रेमी युगल की
याद दिलाते हैं |
-"पत्थर का दर्द"
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